रविवार, 16 दिसंबर 2012

"बिन किसीके , यह जग अधुरा लगता है"


बिन किसीके ,
यह जग अधुरा लगता है ,
बिन किसीके ,
पूर्णिमा का चाँद भी कहा पूरा लगता है ,
सब कुछ वही तो है ,
फिर क्यों ? सब कुछ अधुरा लगता है ,
सावन आता है , चला जाता है ,
पता ही नहीं च
लता हरियाली आक़े चली भी गई ,
क्या सच में हरियाली आई भी थी ?
फिर इस प्रकृति का श्रंगार हुवा भी था ,
मुझे तो वह सब स्वप्न लगा ,
पंछी तो अब भी गाते है ,
पर अब तान उनकी कुछ बदली सी लगती है ,
समीर अब भी चलती है ,
पहले चलती थी मदहोशी में ,
अब खामोसी में ,
पहले भी कोई रोता था ,
जताने के लिए ,मनाने के लिए ,
वाही दौर अब भी जारी है ,
अब भी कोई रोता है ,
छुपाने के लिए ,दबाने के लिए ,
फिर मानस पर एक ही ख्याल आता है,
बिन किसीके ,
सबकुछ अधुरा लगता है ,
फिर सोचता हूँ मनुष्य की पीड़ा ,
यह फूल ,भँवरे ,समीर ,वादियाँ केसे जानते है ?
यह फूल न सही पोधा तो वाही है ,
फिर क्यों ? फूलों ने महकाना छोड़ दिया ,
भँवरे तब भी गुनगुनाते थे ,मंडराते थे ,
अब आवाज उनकी कर्कस लगती है ,
वादियों की शमा को क्या हुवा ?
इन वादियों को भी इंतजार है किसीका,
अरे ! इस समीर को क्या हुवा ?
बहारे बिखेर देने वाली ,
अब सब कुछ समेटे बैठी है ,
अरे ! यह क्या ? सरे तीज -त्यौहार निकल गए ,
में तो समझा यह सब स्वप्न था ,
फिर मानस पटल पर इक ही ख्याल आता है ,
बिन किसीके यह जग अधुरा लगता है .........
------संजय जाटव --------

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