वो दिन क्या गए ,जैसे सबकुछ चला गया हो ,
अमावस्या की रात में जैसे चाँद कही खो गया हो ,वो हँसी-ख़ुशी के दिन ,वो रूठने मनाने के दिन ,
कुछ समय के बाद जैसे कही खो गए हो ,
बदलता कोई तो शिकायत भी होती ,
पर शिकायत करू भी तो किसकी ,
खुद जो बदल चूका हूँ मै ,
कुछ कसमे -वादे किये तो साथ में थे ,
अब कसमे -वादे सब मेरे ,
बाकी सब तोड़ इन्हे कही खो चुके है ,
जिन्दगी की इस दौड़ में एक -दूजे को छोड़ चुके है ,
वो दिन क्या गए ,जैसे सबकुछ चला गया हो ,
अमावस्या की रात में जैसे चाँद कही खो गया हो ,
शिकवा नही की वो अब छुट चुके है ,
गिला तो इसका है की वे भूल चुके है ,
रिश्तो डोर में जहाँ कभी ,
पुरोते थे अपनेपन के मोती ,
दुनिया की कसमकस में वो डोर ,
जैसे टूट गई है ,
मोती वो प्रेम के अब बिखर चुके है ,
वो दिन क्या गए जैसे सबकुछ चला गया हो ,
अमावस्या की रात में जैसे चाँद कही खो गया हो /
------संजय जाटव------
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