सोमवार, 4 मई 2026


"मेरे गाँव ने समेटे रखा ,यादो का जहां वो सारा"
जन्मा जहाँ और पाया दुलार ढेर सारा ,
आँखे खुली और देखा जहाँ से संसार यह सारा ,
बचपन बिता जहाँ , रह गया अब याद बनकर ,
बचपन में वो माटी से खेलना ,
देख पानी उस पर टूट जाना ,
कितना प्यारा था वो बचपन ,
न कल की फिकर थी न आज का चिन्तन ,
माँ की ममता और पिताजी का कन्धा ,
बस यही तो था मेरा धंधा ,
सुबह -सुबह वो चिड़िया की चहके ,
सूरज की रौशनी में ओस की बुँदे ,
लगती थी मानो जैसे मोती हो कोई ,
बचपन के वो खेल भी कहाँ भुला पाया हूँ ,
मिटटी में पानी मिला जहाँ छोटा सा घर बनाता था ,
लुका छुपी का खेल भी मन को कितना भाता था ,
समय भी संग-संग चल रहा था ,
छीन खिलोनो और खेलो को ,एक जगह ले गया ,
सुध न थी की क्या चल रहा है ,
बैठे थे कुछ बच्चे मै भी बैठ गया ,
थमा श्यामपट्ट हाथो मै चोक से कुछ बनाया था ,
घर गया तो बताया बेटा आज स्कुल गया था,
तब जाना की स्कुल था और छड़ी वाले टीचर ,
वर्षा हो या ठण्ड फिर तो स्कुल ही मन को भाया था ,
भरी बरसात मे कीचड़ रोंधकर कई बार जो स्कुल गया था ,
बचपन बिता जिस गाँव मे ,
बालकपन भी उसी मे बिता ,
अब तक जोड़ चूका पुस्तक पेन से नाता था ,
घर नहीं ,पर खेत मे बैठकर पड़ना मन को भाता था ,
खेतो की हरियाली और पेड़ो की मुस्कराहट ,
चिड़िया की चाहको और बगुले की आहट,
खेतो मे छल-छल करता सिचाई का जल ,
गेंदों पर मंडराता भंवरा और मेड़ पर पड़ा वो हल ,
कुछ नाते इन सब से बन गए थे ,
आम का वह पेड़ जैसे रोजाना इंतजार करता था ,
बैठ जिसके निचे मै ढलते सूरज को तकता था ,
शांति का गढ़ जो मैंने पा लिया था ,
प्रकृति की मुग्धता को पहचान लिया था ,
सुबह जितनी सुहानी होती थी ,
उतनी ही शाम भी होती थी ,
शाम होते ही उड़ती धुल मे,
गायों की हलचल होती थी ,
ढलते सूरज की रौशनी मे ,
लोटते पंछियों की सुरमय आवाजो मे ,
गो-खुरो के वो चिन्ह ,
आज भी प्रतीत होते है ,
शाम होते ही जो गायो की फिकर होती थी ,
खिला चारा जिनको माँ संतुष्ट होती थी ,
रहा बचपन जिस पावन माटी मे ,
और बालकपन भी जिसमे बीत गया ,
वही पावन गाँव मेरा ,
कॉलेज हेतु छुट गया ,
आज सब कुछ बदल गया है ,
पर मेरा बचपन ,मै और मेरा गाँव ,
आज भी यादो मै है ,
छुट्टियों में जाते ही जहाँ ,
सारे द्रश्य उभर आते है ,
कंक्रीट में दबी वो धुल और ,
गो-खुर कहीं नजर न आते है ,
जाता हूँ खेतो पर तो अनायास ही ,
सारे दिन वो याद आते है ,
बयां करता है वह ,
आम का पेड़ अपनी नाराजगी ,
खेत भी गुस्साए है मुझसे ,
फसल को चाहे नया सा लगूं ,
पर खेत के लिए तो में वही हूँ .............
-----संजय जाटव-----

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

"रिश्तो में बस्ती है जिंदगी"

रिश्तो में  बस्ती है जिंदगी

माँ कि गोद में पलती,ममता से सवरती,
पिताजी कि ऊँगली थाम,चलना सीखती है जिंदगी |

माँ कि आँखों में सँवरता , घर के आँगन में लड़खड़ा के चलता ,
नटखट शरारतो से भरा ,बचपन है जिंदगी |

बचपन के उल्लास 
में , वह मासूमियत ,

पिताजी के कंधो से , मेला  देखती है जिंदगी |

भाई -बहनो से ,प्यार भरे लड़ाई झगड़े ,
मोहल्ले कि गलियों में , लुका छुपी का खेल है जिंदगी |

दादीजी के लाड़-प्यार और रातो कि कहानियाँ,
दादाजी के संग खेत पर ,गेहूँ कि बालियों को सहलाना है जिंदगी |

बहन कि राखी में बंधा , रक्षा वचन,
खेत कि पगडंडियों पर भाई के साथ , 
दौड़ना है जिंदगी |


बितते बचपन कि यादों में ,
जवानी में रखती है , कदम जिंदगी |

किसीके कस्मे वादो , कुछ पाने के पक्के इरादो ,
किसीके संग सातो-जनम , जीने की चाहत में बस्ती है जिंदगी |

किसीके आंसुओं को , मोती सा समझ ,
उसकी भीगी यादो में , जीना है जिंदगी |

माँ -बाप का प्यार जब , सबसे पावन लगे |

बचपन कि उन यादो में जब ,
खेत खलिहान ,
कहानियाँ,
पगडंडियों पर  दौड़े ,
सड़क पर उड़ती उस मिट्टी का कण -कण उमंग भरे तब ,
उसी आँगन में बैठ , कविता लिखवाती है जिंदगी ,
हाँ , रिश्तो में बस्ती है जिंदगी ||
----संजय जाटव ---

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |

कभी-कभी जाकर, अतीत के साये में ,
फिर वो चंद ,मुलाकात लिखता हूँ |

सिमट चुके है ,जो मिट्टी में,
झरोखा बन, वो अहसास लिखता हूँ |

वो निर्झर आंसू, तेरे नैनो के ,
बहा ही, देते है मुझको |

बन कस्ती यादो कि,
फिर वो, आँसुओ का सेलाब लिखता हूँ |

दूर होकर भी जैसे ,हर दम है तू साथ मेरे ,
हर रात बस स्वप्न तेरा , और वो सुहाना मिलन अपना |


 बनके राही सपनो का , फिर वो अपना मिलन लिखता हूँ |

तू कहती थी न ,हम बिछड़ न पाएँगे कभी ,
याद बनकर तूने, सम्भाले है वादे सभी |

बनकर प्रेम दीवाना, यादो का कैदी ,
तेरा हर एक वादा लिखता हूँ |

तेरे आने कि आहट ,जैसे मुझे लग जाती थी ,
तू आँखों में झांक मेरी , सबकुछ जैसे पढ़ लेती थी |


सुख गई है, अब आँखे मेरी ,
बस हरदम, तेरी आहट रहती है |

तेरी आहट थाम लेती है ,कलम मेरी ,
हाथो में लेकर हाथ 
तेरा  , साथ बिताये वो सारे पल लिखता हूँ |

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |

कभी-कभी जाकर अतीत के साये में ,
फिर वो चंद मुलाकात लिखता हूँ |
                  ----संजय जाटव---




शनिवार, 28 दिसंबर 2013

ओ, हिन्द-धरा तुझे नमन है,

 ओ, हिन्द-धरा तुझे नमन है,
 तेरे कण-कण को ह्रदय-वंदन है,
 मेरे देश कि माटी, तू मेरा अभिमान है,
 तेरी शोंधी खुशबु मेरे प्राण है, 
 हर जनम और सदी में, 
 तेरी गोद मिले ,यही अरमान है,
 मेरे देश कि माटी,तू मेरे प्राण है,
 ओ,जम्बू -धरा तेरा प्रेम मुझको, 
 युग-युग तक मिलता रहे, 
 जीवन डगर पर पग-पग पर , 
 तेरी ममता यूँ ही बनी रही, 
 ओ ,हिन्द धरा तुझे नमन है,
  तेरे कण-कण को ह्रदय-वंदन है ||
                  ------संजय जाटव----

शनिवार, 16 नवंबर 2013

नहीं थके ए नैन

नहीं थके ए नैन ,
अब भी राह ताकते,
 तेरा वह स्वप्न ,
हकीकत में ही आकते , 
वो मंजर वो दरिया और वो किनारा , 
धड़कन और सांसो का बस तू ही सहारा, 
तेरा वह सपनो में आकर इनको कायल कर देना , 
पल भर में इनमे फिर स्वप्न भर देना , 
चुप्पी साधे होंठो से हंसी बन निखरना,
 तेरी नादानी और गलतियों को , 
तेरी उस मासूम हंसी को सुनने , 
तेरे उस बचकाने अंदाज को देखने, 
हाँ, नहीं धके ए नैन अब भी राह ताकते ..... 
                  -------संजय जाटव-----

सोमवार, 16 सितंबर 2013

रे मनवा मान ले

रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले,
हर चेहरे पर है नकाब,
तू इतना पहचान ले,
गैर कभी अपने नहीं होते,
फिर क्यों ? तू अंजान है,
तेरी भी है जिंदगानी,
बस तू इतना जान ले,
तू राही है बस चलता जा,
बिना रुके, बिना मुड़े,
कई मोड़ अभी बाकी है,
ये तो सिर्फ शुरुआत है,
रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले,
सामने तेरे जिंदगानी है,
जिसको सिर्फ तुझे निभानी है,
हाथों से तेरे निकलता वर्तमान,
हर क्षण अतीत होता जा रहा,
जिस भविष्य की आस है तुझको,
उसी को वर्तमान समझ तू जी रहा,
न भटक हर कहीं,
ये जीवन है तेरी कहानी,
तुझको है इसे रचना,
हर पन्ने, हर पंक्ति पर,
एक-एक परिस्थिति पर,
तुझे है सजग रहना,
तू चाहे तो स्वर्णिम बना,
या चाहे तो कर दे तबाह,
रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले,
हर विषय, हर वस्तु,
सब बाधा है तेरे लिए,
इनसे बचना ही तेरी परीक्षा,
दुनिया की भीड़ में ना हो लहूलुहान,
गाठ ये तू बाँध ले,
रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले |
-----संजय जाटव------

सोमवार, 8 जुलाई 2013

"जिन्दगी को समझ सके तो कुछ बात हो"

जिन्दगी को समझ सके तो कुछ बात हो ,
जिन्दगी तो हर कोई जी लेता है ,
इसे समझ पायें तो कुछ बात हो ,
रिश्ते बनाना आसान है ,
इसकी कीमत जान सके तो कुछ बात हो ,
हर पल मरती इस जिंदगी के ,
पल-पल को जी सके,तो कुछ बात हो,
बनते है अपने कई,बनकर बिछड़ भी जाते है,
उनके साथ बिताये हर पल संभाल सके,
तो कुछ बात हो,
हर धड़कन हर सांस में छुपी है,
जिंदगी की असल सच्चाई,
उसकी इस सच्चाई को जान सके,
तो कुछ बात हो,
जिंदगी की इस कश्मकश में,
खुद को जान सके,तो कुछ बात हो,
हर जर्रा हर दृश्य समेटे है खूबसूरती,
हर कही सुन्दरता देख सके, तो कुछ बात हो,
जिंदगी एक सफ़र है, दुःख-सुख इसके मोड़,
हर मोड़ पे खुद को संभाल सके,
तो कुछ बात हो............
-----संजय जाटव---