गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |
कभी-कभी जाकर, अतीत के साये में ,
फिर वो चंद ,मुलाकात लिखता हूँ |
सिमट चुके है ,जो मिट्टी में,
झरोखा बन, वो अहसास लिखता हूँ |
वो निर्झर आंसू, तेरे नैनो के ,
बहा ही, देते है मुझको |
बन कस्ती यादो कि,
फिर वो, आँसुओ का सेलाब लिखता हूँ |
दूर होकर भी जैसे ,हर दम है तू साथ मेरे ,
हर रात बस स्वप्न तेरा , और वो सुहाना मिलन अपना |
बनके राही सपनो का , फिर वो अपना मिलन लिखता हूँ |
तू कहती थी न ,हम बिछड़ न पाएँगे कभी ,
याद बनकर तूने, सम्भाले है वादे सभी |
बनकर प्रेम दीवाना, यादो का कैदी ,
तेरा हर एक वादा लिखता हूँ |
तेरे आने कि आहट ,जैसे मुझे लग जाती थी ,
तू आँखों में झांक मेरी , सबकुछ जैसे पढ़ लेती थी |
सुख गई है, अब आँखे मेरी ,
बस हरदम, तेरी आहट रहती है |
तेरी आहट थाम लेती है ,कलम मेरी ,
हाथो में लेकर हाथ तेरा , साथ बिताये वो सारे पल लिखता हूँ |
गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |
कभी-कभी जाकर अतीत के साये में ,
फिर वो चंद मुलाकात लिखता हूँ |
----संजय जाटव---
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |
कभी-कभी जाकर, अतीत के साये में ,
फिर वो चंद ,मुलाकात लिखता हूँ |
सिमट चुके है ,जो मिट्टी में,
झरोखा बन, वो अहसास लिखता हूँ |
वो निर्झर आंसू, तेरे नैनो के ,
बहा ही, देते है मुझको |
बन कस्ती यादो कि,
फिर वो, आँसुओ का सेलाब लिखता हूँ |
दूर होकर भी जैसे ,हर दम है तू साथ मेरे ,
हर रात बस स्वप्न तेरा , और वो सुहाना मिलन अपना |
बनके राही सपनो का , फिर वो अपना मिलन लिखता हूँ |
तू कहती थी न ,हम बिछड़ न पाएँगे कभी ,
याद बनकर तूने, सम्भाले है वादे सभी |
बनकर प्रेम दीवाना, यादो का कैदी ,
तेरा हर एक वादा लिखता हूँ |
तेरे आने कि आहट ,जैसे मुझे लग जाती थी ,
तू आँखों में झांक मेरी , सबकुछ जैसे पढ़ लेती थी |
सुख गई है, अब आँखे मेरी ,
बस हरदम, तेरी आहट रहती है |
तेरी आहट थाम लेती है ,कलम मेरी ,
हाथो में लेकर हाथ तेरा , साथ बिताये वो सारे पल लिखता हूँ |
गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |
कभी-कभी जाकर अतीत के साये में ,
फिर वो चंद मुलाकात लिखता हूँ |
----संजय जाटव---
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