बुधवार, 2 अप्रैल 2014

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |

कभी-कभी जाकर, अतीत के साये में ,
फिर वो चंद ,मुलाकात लिखता हूँ |

सिमट चुके है ,जो मिट्टी में,
झरोखा बन, वो अहसास लिखता हूँ |

वो निर्झर आंसू, तेरे नैनो के ,
बहा ही, देते है मुझको |

बन कस्ती यादो कि,
फिर वो, आँसुओ का सेलाब लिखता हूँ |

दूर होकर भी जैसे ,हर दम है तू साथ मेरे ,
हर रात बस स्वप्न तेरा , और वो सुहाना मिलन अपना |


 बनके राही सपनो का , फिर वो अपना मिलन लिखता हूँ |

तू कहती थी न ,हम बिछड़ न पाएँगे कभी ,
याद बनकर तूने, सम्भाले है वादे सभी |

बनकर प्रेम दीवाना, यादो का कैदी ,
तेरा हर एक वादा लिखता हूँ |

तेरे आने कि आहट ,जैसे मुझे लग जाती थी ,
तू आँखों में झांक मेरी , सबकुछ जैसे पढ़ लेती थी |


सुख गई है, अब आँखे मेरी ,
बस हरदम, तेरी आहट रहती है |

तेरी आहट थाम लेती है ,कलम मेरी ,
हाथो में लेकर हाथ 
तेरा  , साथ बिताये वो सारे पल लिखता हूँ |

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |

कभी-कभी जाकर अतीत के साये में ,
फिर वो चंद मुलाकात लिखता हूँ |
                  ----संजय जाटव---




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