जब -जब अपनों की याद आई ,
तब -तब मैंने रोना चाहा ,
जब-जब समय ने धोका दिया ,
तब -तब मैंने लिखना चाहा ,
जब-जब अपनों की याद आई ,
तब-तब मैंने लिखना चाहा ,
हर लम्हों और यादो को मैंने ,
हर दम लिखना चाहा ,
लिखना ही मेरी जिन्दगी है ,
मेरी आँखों में कभी आंसू तो कभी नमी है ,
इन आंसुओ को मैंने हर दम लिखना चाहा ,
जब-जब दुनिया ने नाता तोडा ,
कुछ अपनों और परायो ने छोड़ा ,
तब -तब मैंने लिखना चाहा ,
मेरी जिन्दगी में जब- जब कोई नयी शुरुवात हुई ,
या छाया हो गम का अँधेरा ,
हर घड़ी ,हर लम्हे को मैंने ,
तब-तब लिखना चाहा ,
लिखना ही मेरी जिन्दगी है ,
अतीत की यादो को पड़ना मेरा शोक ,
अतीत की इन यादो मैं मैंने हर दम डूबना चाहा ,
जब -जब अपनों की याद आई ,
तब-तब मैंने लिखना चाहा ,
किनारों से कस्ती और कस्ती से फिर मस्ती तक,
खेतो से खलिहानों तक और खलिहानों से फिर बगियानो तक,
चिड़िया की चाहको और सरसों की महकती फसलो तक ,
सावन के हिलोरे और गाँव की माटी तक ,
उगते सूरज से ढलती शाम तक ,
माँ की लोरी से पिताजी की उम्मीदों तक ,
मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान के प्रांगण से गाँव की यादो तक,
इन यादो को मैंने हर दम लिखना चाहा ,
जब-जब अतीत की याद आती है ,
मेरी आंखे नम हो जाती है ,
स्कुल के उन दिनों को मैंने ,
हर दम लिखना चाहा,
जिन स्कूली दिनों को मैंने हमेशा जीना चाहा ,
पर .................................,
आँखों के इन आंसुओ ने मुझे ,
हर दम रोकना चाहा ,
भीग जाते है आंसुओ में कागज सारे ,
और कलम रोने पर मजबूर हो जाती है,
आंसुओ से भीगे इन कागजो ,
और रोती कलम ने मुझे हर दम रोकना चाहा ,
जब-जब अपनों की याद आई ,
तब -तब मैंने लिखना चाहा ....
--संजय जाटव----
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