गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

"रिश्तो में बस्ती है जिंदगी"

रिश्तो में  बस्ती है जिंदगी

माँ कि गोद में पलती,ममता से सवरती,
पिताजी कि ऊँगली थाम,चलना सीखती है जिंदगी |

माँ कि आँखों में सँवरता , घर के आँगन में लड़खड़ा के चलता ,
नटखट शरारतो से भरा ,बचपन है जिंदगी |

बचपन के उल्लास 
में , वह मासूमियत ,

पिताजी के कंधो से , मेला  देखती है जिंदगी |

भाई -बहनो से ,प्यार भरे लड़ाई झगड़े ,
मोहल्ले कि गलियों में , लुका छुपी का खेल है जिंदगी |

दादीजी के लाड़-प्यार और रातो कि कहानियाँ,
दादाजी के संग खेत पर ,गेहूँ कि बालियों को सहलाना है जिंदगी |

बहन कि राखी में बंधा , रक्षा वचन,
खेत कि पगडंडियों पर भाई के साथ , 
दौड़ना है जिंदगी |


बितते बचपन कि यादों में ,
जवानी में रखती है , कदम जिंदगी |

किसीके कस्मे वादो , कुछ पाने के पक्के इरादो ,
किसीके संग सातो-जनम , जीने की चाहत में बस्ती है जिंदगी |

किसीके आंसुओं को , मोती सा समझ ,
उसकी भीगी यादो में , जीना है जिंदगी |

माँ -बाप का प्यार जब , सबसे पावन लगे |

बचपन कि उन यादो में जब ,
खेत खलिहान ,
कहानियाँ,
पगडंडियों पर  दौड़े ,
सड़क पर उड़ती उस मिट्टी का कण -कण उमंग भरे तब ,
उसी आँगन में बैठ , कविता लिखवाती है जिंदगी ,
हाँ , रिश्तो में बस्ती है जिंदगी ||
----संजय जाटव ---

1 टिप्पणी:

Sanjay Jatav ने कहा…

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