शनिवार, 24 नवंबर 2012

"मैंने गाँवो को बदलते देखा है"


 
मैंने समय को बदलते देखा है,
संग समय के गाँवो को बदलते देखा है ,
गाँवो की उस पावन माटी को ,
कांक्रीट होते देखा है ,
अब नहीं उड़ा करती वो पावन माटी ,
मैंने गाँवो की डगर को अडिग होते देखा है ,
मैंने गाँवो को बदलते देखा है,
अब नहीं घुमा करते शेर भी जंगलो में ,
मैंने वनों को कटते ,जानवरों को भागते देखा है ,
वन के राजा को मैंने शर्कस में जाते देखा है ,
जो हुवा करता था जंगलो का राजा ,
उसी देश के गौरव को मैंने भूखे मरते देखा है ,
हाँ मैंने जंगल के राजा को चिड़ियाघर में बेबस देखा है,
मैंने गाँवो को शहर बनते देखा है ,
जो गाँव तो न रहे पर शहर भी न बन पाएँ,
मैंने गाँवो की ललित कलाओ को मरते देखा है ,
कहा रहे अब गाँवो के चौपाले ,
और कहा रही अब दीपों की रोशनी,
मैंने राम धुनों और प्रभातफेरी को बंद होते देखा है ,
बचपन में भोर में सुनाई देती थी रामधुने,
हाँ मैंने मंगलगीत की रीत को बंद होते देखा है ,
अब न तो मयुर ही गाता है ,
और न ही कोयल तान सुनाती है ,
मयुर को पलायन और कोयल के घोसले को तोड़ते देखा है,
मैंने गाँवो को बदलते देखा है ,
आधुनिकता की आँधी को मैंने ,
गाँवो में घुसते देखा है ,
जहर फेलते पश्चात्यता का मैंने ,
गाँवो के रग-रग में देखा है,
पावन रोशनी अब दीपों की बंद हुई,
मैंने बिजली को चोंधयाते देखा है,
धरती का सीना चीरती मैंने मशीनों को देखा है ,
मैंने स्वार्थी इंशान के बदलते चहरे को देखा है ,
मैंने गाँवो की माटी पर ,
शहर बसते देखा है ,
कारखानों का 
काला  धुँआ ,

गाँवो में फेलते देखा है,
मैंने गाँवो का परिवेश बदलते देखा है,
मैंने गाँवो की शांति को उजड़ते देखा है ,
हाँ मैंने गाँवो को बदलते देखा है .......संजय जाटव

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