सोमवार, 4 मई 2026


"मेरे गाँव ने समेटे रखा ,यादो का जहां वो सारा"
जन्मा जहाँ और पाया दुलार ढेर सारा ,
आँखे खुली और देखा जहाँ से संसार यह सारा ,
बचपन बिता जहाँ , रह गया अब याद बनकर ,
बचपन में वो माटी से खेलना ,
देख पानी उस पर टूट जाना ,
कितना प्यारा था वो बचपन ,
न कल की फिकर थी न आज का चिन्तन ,
माँ की ममता और पिताजी का कन्धा ,
बस यही तो था मेरा धंधा ,
सुबह -सुबह वो चिड़िया की चहके ,
सूरज की रौशनी में ओस की बुँदे ,
लगती थी मानो जैसे मोती हो कोई ,
बचपन के वो खेल भी कहाँ भुला पाया हूँ ,
मिटटी में पानी मिला जहाँ छोटा सा घर बनाता था ,
लुका छुपी का खेल भी मन को कितना भाता था ,
समय भी संग-संग चल रहा था ,
छीन खिलोनो और खेलो को ,एक जगह ले गया ,
सुध न थी की क्या चल रहा है ,
बैठे थे कुछ बच्चे मै भी बैठ गया ,
थमा श्यामपट्ट हाथो मै चोक से कुछ बनाया था ,
घर गया तो बताया बेटा आज स्कुल गया था,
तब जाना की स्कुल था और छड़ी वाले टीचर ,
वर्षा हो या ठण्ड फिर तो स्कुल ही मन को भाया था ,
भरी बरसात मे कीचड़ रोंधकर कई बार जो स्कुल गया था ,
बचपन बिता जिस गाँव मे ,
बालकपन भी उसी मे बिता ,
अब तक जोड़ चूका पुस्तक पेन से नाता था ,
घर नहीं ,पर खेत मे बैठकर पड़ना मन को भाता था ,
खेतो की हरियाली और पेड़ो की मुस्कराहट ,
चिड़िया की चाहको और बगुले की आहट,
खेतो मे छल-छल करता सिचाई का जल ,
गेंदों पर मंडराता भंवरा और मेड़ पर पड़ा वो हल ,
कुछ नाते इन सब से बन गए थे ,
आम का वह पेड़ जैसे रोजाना इंतजार करता था ,
बैठ जिसके निचे मै ढलते सूरज को तकता था ,
शांति का गढ़ जो मैंने पा लिया था ,
प्रकृति की मुग्धता को पहचान लिया था ,
सुबह जितनी सुहानी होती थी ,
उतनी ही शाम भी होती थी ,
शाम होते ही उड़ती धुल मे,
गायों की हलचल होती थी ,
ढलते सूरज की रौशनी मे ,
लोटते पंछियों की सुरमय आवाजो मे ,
गो-खुरो के वो चिन्ह ,
आज भी प्रतीत होते है ,
शाम होते ही जो गायो की फिकर होती थी ,
खिला चारा जिनको माँ संतुष्ट होती थी ,
रहा बचपन जिस पावन माटी मे ,
और बालकपन भी जिसमे बीत गया ,
वही पावन गाँव मेरा ,
कॉलेज हेतु छुट गया ,
आज सब कुछ बदल गया है ,
पर मेरा बचपन ,मै और मेरा गाँव ,
आज भी यादो मै है ,
छुट्टियों में जाते ही जहाँ ,
सारे द्रश्य उभर आते है ,
कंक्रीट में दबी वो धुल और ,
गो-खुर कहीं नजर न आते है ,
जाता हूँ खेतो पर तो अनायास ही ,
सारे दिन वो याद आते है ,
बयां करता है वह ,
आम का पेड़ अपनी नाराजगी ,
खेत भी गुस्साए है मुझसे ,
फसल को चाहे नया सा लगूं ,
पर खेत के लिए तो में वही हूँ .............
-----संजय जाटव-----

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

"रिश्तो में बस्ती है जिंदगी"

रिश्तो में  बस्ती है जिंदगी

माँ कि गोद में पलती,ममता से सवरती,
पिताजी कि ऊँगली थाम,चलना सीखती है जिंदगी |

माँ कि आँखों में सँवरता , घर के आँगन में लड़खड़ा के चलता ,
नटखट शरारतो से भरा ,बचपन है जिंदगी |

बचपन के उल्लास 
में , वह मासूमियत ,

पिताजी के कंधो से , मेला  देखती है जिंदगी |

भाई -बहनो से ,प्यार भरे लड़ाई झगड़े ,
मोहल्ले कि गलियों में , लुका छुपी का खेल है जिंदगी |

दादीजी के लाड़-प्यार और रातो कि कहानियाँ,
दादाजी के संग खेत पर ,गेहूँ कि बालियों को सहलाना है जिंदगी |

बहन कि राखी में बंधा , रक्षा वचन,
खेत कि पगडंडियों पर भाई के साथ , 
दौड़ना है जिंदगी |


बितते बचपन कि यादों में ,
जवानी में रखती है , कदम जिंदगी |

किसीके कस्मे वादो , कुछ पाने के पक्के इरादो ,
किसीके संग सातो-जनम , जीने की चाहत में बस्ती है जिंदगी |

किसीके आंसुओं को , मोती सा समझ ,
उसकी भीगी यादो में , जीना है जिंदगी |

माँ -बाप का प्यार जब , सबसे पावन लगे |

बचपन कि उन यादो में जब ,
खेत खलिहान ,
कहानियाँ,
पगडंडियों पर  दौड़े ,
सड़क पर उड़ती उस मिट्टी का कण -कण उमंग भरे तब ,
उसी आँगन में बैठ , कविता लिखवाती है जिंदगी ,
हाँ , रिश्तो में बस्ती है जिंदगी ||
----संजय जाटव ---

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |

कभी-कभी जाकर, अतीत के साये में ,
फिर वो चंद ,मुलाकात लिखता हूँ |

सिमट चुके है ,जो मिट्टी में,
झरोखा बन, वो अहसास लिखता हूँ |

वो निर्झर आंसू, तेरे नैनो के ,
बहा ही, देते है मुझको |

बन कस्ती यादो कि,
फिर वो, आँसुओ का सेलाब लिखता हूँ |

दूर होकर भी जैसे ,हर दम है तू साथ मेरे ,
हर रात बस स्वप्न तेरा , और वो सुहाना मिलन अपना |


 बनके राही सपनो का , फिर वो अपना मिलन लिखता हूँ |

तू कहती थी न ,हम बिछड़ न पाएँगे कभी ,
याद बनकर तूने, सम्भाले है वादे सभी |

बनकर प्रेम दीवाना, यादो का कैदी ,
तेरा हर एक वादा लिखता हूँ |

तेरे आने कि आहट ,जैसे मुझे लग जाती थी ,
तू आँखों में झांक मेरी , सबकुछ जैसे पढ़ लेती थी |


सुख गई है, अब आँखे मेरी ,
बस हरदम, तेरी आहट रहती है |

तेरी आहट थाम लेती है ,कलम मेरी ,
हाथो में लेकर हाथ 
तेरा  , साथ बिताये वो सारे पल लिखता हूँ |

गुजरे कल कि हलचल लिखता हूँ ,
सिमटे -बिखरे वो पल लिखता हूँ |

कभी-कभी जाकर अतीत के साये में ,
फिर वो चंद मुलाकात लिखता हूँ |
                  ----संजय जाटव---




शनिवार, 28 दिसंबर 2013

ओ, हिन्द-धरा तुझे नमन है,

 ओ, हिन्द-धरा तुझे नमन है,
 तेरे कण-कण को ह्रदय-वंदन है,
 मेरे देश कि माटी, तू मेरा अभिमान है,
 तेरी शोंधी खुशबु मेरे प्राण है, 
 हर जनम और सदी में, 
 तेरी गोद मिले ,यही अरमान है,
 मेरे देश कि माटी,तू मेरे प्राण है,
 ओ,जम्बू -धरा तेरा प्रेम मुझको, 
 युग-युग तक मिलता रहे, 
 जीवन डगर पर पग-पग पर , 
 तेरी ममता यूँ ही बनी रही, 
 ओ ,हिन्द धरा तुझे नमन है,
  तेरे कण-कण को ह्रदय-वंदन है ||
                  ------संजय जाटव----

शनिवार, 16 नवंबर 2013

नहीं थके ए नैन

नहीं थके ए नैन ,
अब भी राह ताकते,
 तेरा वह स्वप्न ,
हकीकत में ही आकते , 
वो मंजर वो दरिया और वो किनारा , 
धड़कन और सांसो का बस तू ही सहारा, 
तेरा वह सपनो में आकर इनको कायल कर देना , 
पल भर में इनमे फिर स्वप्न भर देना , 
चुप्पी साधे होंठो से हंसी बन निखरना,
 तेरी नादानी और गलतियों को , 
तेरी उस मासूम हंसी को सुनने , 
तेरे उस बचकाने अंदाज को देखने, 
हाँ, नहीं धके ए नैन अब भी राह ताकते ..... 
                  -------संजय जाटव-----

सोमवार, 16 सितंबर 2013

रे मनवा मान ले

रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले,
हर चेहरे पर है नकाब,
तू इतना पहचान ले,
गैर कभी अपने नहीं होते,
फिर क्यों ? तू अंजान है,
तेरी भी है जिंदगानी,
बस तू इतना जान ले,
तू राही है बस चलता जा,
बिना रुके, बिना मुड़े,
कई मोड़ अभी बाकी है,
ये तो सिर्फ शुरुआत है,
रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले,
सामने तेरे जिंदगानी है,
जिसको सिर्फ तुझे निभानी है,
हाथों से तेरे निकलता वर्तमान,
हर क्षण अतीत होता जा रहा,
जिस भविष्य की आस है तुझको,
उसी को वर्तमान समझ तू जी रहा,
न भटक हर कहीं,
ये जीवन है तेरी कहानी,
तुझको है इसे रचना,
हर पन्ने, हर पंक्ति पर,
एक-एक परिस्थिति पर,
तुझे है सजग रहना,
तू चाहे तो स्वर्णिम बना,
या चाहे तो कर दे तबाह,
रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले,
हर विषय, हर वस्तु,
सब बाधा है तेरे लिए,
इनसे बचना ही तेरी परीक्षा,
दुनिया की भीड़ में ना हो लहूलुहान,
गाठ ये तू बाँध ले,
रे मनवा मान ले,
छलावा है दुनिया तू जान ले |
-----संजय जाटव------

सोमवार, 8 जुलाई 2013

"जिन्दगी को समझ सके तो कुछ बात हो"

जिन्दगी को समझ सके तो कुछ बात हो ,
जिन्दगी तो हर कोई जी लेता है ,
इसे समझ पायें तो कुछ बात हो ,
रिश्ते बनाना आसान है ,
इसकी कीमत जान सके तो कुछ बात हो ,
हर पल मरती इस जिंदगी के ,
पल-पल को जी सके,तो कुछ बात हो,
बनते है अपने कई,बनकर बिछड़ भी जाते है,
उनके साथ बिताये हर पल संभाल सके,
तो कुछ बात हो,
हर धड़कन हर सांस में छुपी है,
जिंदगी की असल सच्चाई,
उसकी इस सच्चाई को जान सके,
तो कुछ बात हो,
जिंदगी की इस कश्मकश में,
खुद को जान सके,तो कुछ बात हो,
हर जर्रा हर दृश्य समेटे है खूबसूरती,
हर कही सुन्दरता देख सके, तो कुछ बात हो,
जिंदगी एक सफ़र है, दुःख-सुख इसके मोड़,
हर मोड़ पे खुद को संभाल सके,
तो कुछ बात हो............
-----संजय जाटव---

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

"वो दिन क्या गए ,जैसे सबकुछ चला गया हो"

 वो दिन क्या गए ,जैसे सबकुछ चला गया हो ,

 अमावस्या की रात में जैसे चाँद कही खो गया हो ,
वो हँसी-ख़ुशी के दिन ,वो रूठने मनाने के दिन ,
कुछ समय के बाद जैसे कही खो गए हो ,
बदलता कोई तो शिकायत भी होती ,
पर शिकायत करू भी तो किसकी ,
खुद जो बदल चूका हूँ मै ,
कुछ कसमे -वादे किये तो साथ में थे ,
अब कसमे -वादे सब मेरे ,
बाकी सब तोड़ इन्हे कही खो चुके है ,
जिन्दगी की इस दौड़ में एक -दूजे को छोड़ चुके है ,
वो दिन क्या गए ,जैसे सबकुछ चला गया हो ,
अमावस्या की रात में जैसे चाँद कही खो गया हो ,
शिकवा नही की वो अब छुट चुके है ,
गिला तो इसका है की वे भूल चुके है ,
रिश्तो डोर में जहाँ कभी ,
पुरोते थे अपनेपन के मोती ,
दुनिया की कसमकस में वो डोर ,
जैसे टूट गई है ,
मोती वो प्रेम के अब बिखर चुके है ,
वो दिन क्या गए जैसे सबकुछ चला गया हो ,
अमावस्या की रात में जैसे चाँद कही खो गया हो /
------संजय जाटव------

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

"जिन्दगी के इस सफर में"

बीते दिनों के कुछ पल ,
गर बातो ही बातो में ,
याद आ जाए तो समझो ,
तुमे अपनों की याद आती है ,
गर अनायास ही झलक जाए ,
अश्रु आँखों से तो समझो ,
तुम्हे अपनों की याद सताती है ,
किन्ही ओरो की आदतों में ,
झलक जाए किसी की आदत ,
तो समझो उनकी बाते तुममे जिन्दा है ,
भरी भीड़ में न चाहकर भी ,
समझ बैठो खुद को अकेला ,
तो समझो कोई अपना तुम खो चुके हो ,
गेरो की आवाजो कभी लग जाए ,
बहुत ही सुनी सी अपनी सी ,
तो समझो तुम्हारी रूह अब तक ,
उन आवाजो की दीवानी है ,
गर रहो लाख व्यस्त तुम ,
पर हर कम में अपनों की खुसी ढूंढते हो ,
तो समझो तुम्हे अपनों की हर दम ,
फिकर रहती है हर हाल में ,
कुछ पाकर भी कुछ न समझो ,
तो तुम बहुत कुछ खो चुके हो ,
बहुत कुछ होकर भी न दिखाना ,
बहुत कुछ होकर भी कुछ न होना ,
गर यही राह है तुम्हारी तो समझो ,
जिन्दगी कुछ -कुछ जीना ,
तुम्हे आ गया है ,
दूर होकर भी कोई तुम्हारे हरदम ,
गर पास है तो समझो ,
अपनों की कीमत तुम जन चुके हो ,
गर आ निकल पड़े अश्रु -धारा,
अनायास ही तो समझो ,
तुम्हे अपनों की याद बहुत आती है /
------संजय जाटव------

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

मेरा गाँव और मेरा बचपन ................


"मेरे गाँव ने समेटे रखा ,यादो का जहां वो सारा"
जन्मा जहाँ और पाया दुलार ढेर सारा ,
आँखे खुली और देखा जहाँ से संसार यह सारा ,
बचपन बिता जहाँ , रह गया अब याद बनकर ,
बचपन में वो माटी से खेलना ,
देख पानी उस पर टूट जाना ,
कितना प्यारा था वो बचपन ,
न कल की फिकर थी न आज का चिन्तन ,
माँ की ममता और पिताजी का कन्धा ,
बस यही तो था मेरा धंधा ,
सुबह -सुबह वो चिड़िया की चहके ,
सूरज की रौशनी में ओस की बुँदे ,
लगती थी मानो जैसे मोती हो कोई ,
बचपन के वो खेल भी कहाँ भुला पाया हूँ ,
मिटटी में पानी मिला जहाँ छोटा सा घर बनाता था ,
लुका छुपी का खेल भी मन को कितना भाता था ,
समय भी संग-संग चल रहा था ,
छीन खिलोनो और खेलो को ,एक जगह ले गया ,
सुध न थी की क्या चल रहा है ,
बैठे थे कुछ बच्चे मै भी बैठ गया ,
थमा श्यामपट्ट हाथो मै चोक से कुछ बनाया था ,
घर गया तो बताया बेटा आज स्कुल गया था,
तब जाना की स्कुल था और छड़ी वाले टीचर ,
वर्षा हो या ठण्ड फिर तो स्कुल ही मन को भाया था ,
भरी बरसात मे कीचड़ रोंधकर कई बार जो स्कुल गया था ,
बचपन बिता जिस गाँव मे ,
बालकपन भी उसी मे बिता ,
अब तक जोड़ चूका पुस्तक पेन से नाता था ,
घर नहीं ,पर खेत मे बैठकर पड़ना मन को भाता था ,
खेतो की हरियाली और पेड़ो की मुस्कराहट ,
चिड़िया की चाहको और बगुले की आहट,
खेतो मे छल-छल करता सिचाई का जल ,
गेंदों पर मंडराता भंवरा और मेड़ पर पड़ा वो हल ,
कुछ नाते इन सब से बन गए थे ,
आम का वह पेड़ जैसे रोजाना इंतजार करता था ,
बैठ जिसके निचे मै ढलते सूरज को तकता था ,
शांति का गढ़ जो मैंने पा लिया था ,
प्रकृति की मुग्धता को पहचान लिया था ,
सुबह जितनी सुहानी होती थी ,
उतनी ही शाम भी होती थी ,
शाम होते ही उड़ती धुल मे,
गायों की हलचल होती थी ,
ढलते सूरज की रौशनी मे ,
लोटते पंछियों की सुरमय आवाजो मे ,
गो-खुरो के वो चिन्ह ,
आज भी प्रतीत होते है ,
शाम होते ही जो गायो की फिकर होती थी ,
खिला चारा जिनको माँ संतुष्ट होती थी ,
रहा बचपन जिस पावन माटी मे ,
और बालकपन भी जिसमे बीत गया ,
वही पावन गाँव मेरा ,
कॉलेज हेतु छुट गया ,
आज सब कुछ बदल गया है ,
पर मेरा बचपन ,मै और मेरा गाँव ,
आज भी यादो मै है ,
छुट्टियों में जाते ही जहाँ ,
सारे द्रश्य उभर आते है ,
कंक्रीट में दबी वो धुल और ,
गो-खुर कहीं नजर न आते है ,
जाता हूँ खेतो पर तो अनायास ही ,
सारे दिन वो याद आते है ,
बयां करता है वह ,
आम का पेड़ अपनी नाराजगी ,
खेत भी गुस्साए है मुझसे ,
फसल को चाहे नया सा लगूं ,
पर खेत के लिए तो में वही हूँ .............
-----संजय जाटव-----

रविवार, 16 दिसंबर 2012

"बिन किसीके , यह जग अधुरा लगता है"


बिन किसीके ,
यह जग अधुरा लगता है ,
बिन किसीके ,
पूर्णिमा का चाँद भी कहा पूरा लगता है ,
सब कुछ वही तो है ,
फिर क्यों ? सब कुछ अधुरा लगता है ,
सावन आता है , चला जाता है ,
पता ही नहीं च
लता हरियाली आक़े चली भी गई ,
क्या सच में हरियाली आई भी थी ?
फिर इस प्रकृति का श्रंगार हुवा भी था ,
मुझे तो वह सब स्वप्न लगा ,
पंछी तो अब भी गाते है ,
पर अब तान उनकी कुछ बदली सी लगती है ,
समीर अब भी चलती है ,
पहले चलती थी मदहोशी में ,
अब खामोसी में ,
पहले भी कोई रोता था ,
जताने के लिए ,मनाने के लिए ,
वाही दौर अब भी जारी है ,
अब भी कोई रोता है ,
छुपाने के लिए ,दबाने के लिए ,
फिर मानस पर एक ही ख्याल आता है,
बिन किसीके ,
सबकुछ अधुरा लगता है ,
फिर सोचता हूँ मनुष्य की पीड़ा ,
यह फूल ,भँवरे ,समीर ,वादियाँ केसे जानते है ?
यह फूल न सही पोधा तो वाही है ,
फिर क्यों ? फूलों ने महकाना छोड़ दिया ,
भँवरे तब भी गुनगुनाते थे ,मंडराते थे ,
अब आवाज उनकी कर्कस लगती है ,
वादियों की शमा को क्या हुवा ?
इन वादियों को भी इंतजार है किसीका,
अरे ! इस समीर को क्या हुवा ?
बहारे बिखेर देने वाली ,
अब सब कुछ समेटे बैठी है ,
अरे ! यह क्या ? सरे तीज -त्यौहार निकल गए ,
में तो समझा यह सब स्वप्न था ,
फिर मानस पटल पर इक ही ख्याल आता है ,
बिन किसीके यह जग अधुरा लगता है .........
------संजय जाटव --------

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

"कुछ यादे बहुत खास होती है"

कुछ यादे बहुत खास होती है ,
जो हर घडी,हर पल मेरे पास होती है ,
बीते जिन्हें चाहे अरसा हो गया हो ,
लगता तो येसे है जेसे अभी ही वो पल गया हो ,
कुछ यादे जो जीवन के रंग बता जाती है ,
कुछ यादे जो अपनों की याद दिला जाती है ,
कुछ यादे जो बहुत खास होती है ,
कुछ होकर भी बहुत कुछ बन मेरे साथ होती है ,
दिन ,महीने,साल भले ही बीते चुके होते है ,
वर्षा ,वसंत ,ग्रीष्म चाहे बदल चुके होते है ,
पर ये यादे हमेशा नूतन बनी रहती है ,
बीते समय को समेटे हुए ,
कुछ खास पालो को संजोए हुए ,
लगता तो येसा की समय शायद ,
बिता था इन्ही पालो में सिमट जाने के लिए ,
वह खास समय ही मेरी याद होती है,
जो दिन - रात ,हर पल ,हर घडी मेरे साथ होती है ,
बीते अरसे की जो जान होती है ,
बस वही मेरी याद होती है ,
उन यादो को भूल से भी न भुला पता हूँ ,
कोशिश करूँ भुलाने की फिर तो भुला ही न पाता हूँ,
अजीब सी आहट छुपी उन यादो में होती है ,
याद आते ही सब कुछ भुला जाती है ,
याद आते ही न जाने कब ,सब कुछ सुनशान सा लगने लगता है ,
वो यादे जो संजोए कुछ पल होती है ,
किसी की उम्मीदों पर फिरा कुछ जल होती है,
कुछ मस्तियो और गमो की हलचल होती है ,
किन्ही अपनों के साथ बिताए कुछ पल होती है ,
निस्वार्थ दोस्ती पर स्वार्थता का छल होती है ,
समाज की रूढ़िवादियो में दबी कोई हलचल होती है ,
आपनो से बिछड़ जाने का गम होती है ,
बदलते नित -निरंतर समय की पहल होती है ,
जिन्हें याद करते ही सदिया वापस आ जाती है ,
जिन्हें याद करते ही समय चक्र घूम सा जाता है ,
जिन्हें याद करते ही अपनों का साथ पा लेता हूँ ,
जो याद आते ही लगता है जेसे सब कुछ मैंने पा लिया है ,
जो याद आते ही लगता है जेसे सब कुछ मैंने संजो लिया है ,
कुछ यादे बहुत खास होती है ,
जो मेरे पल हर दम साथ रहती है .........संजय जाटव.......

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

"मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान"

मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान ,
मध्यप्रदेश का गौरव ,भोपाल की शान ,
चाचा नेहरु व मौलाना आजाद की स्मृति का निशान ,
बने जहाँ अभियंता कई ,पल रहे जहाँ कई अरमान ,
राजधानी की हरियाली में बसा एक नया जहान,
हमारा प्यारा मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान ,
आता है हर कोई यहाँ ,सावन की बहार में ,
वर्षा की बूंदों और ठंडी सी हिसार में ,
नए सपने ,नए दोस्त ,एक फिर नया जहान,
हर कोई करता है शुरू जहाँ फिर एक नई उड़ान ,
यही है हमारा .....
मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान
समेटे है जो पूर्व अभियंताओ की यादो के निशान ,
भारतवर्ष के कोने -कोने से समेटे जिसने अरमान ,
हर भाषा ,हर तहजीब ,हर राज्य का यह इमान ,
हुए कई अभियंता येसे कर दिया जिनने इसका ऊँचा नाम ,
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खोले जिसने आगमन के द्वार ,
राष्ट्र निर्माण में दे रहा जो अहम योगदान ,
हमारा प्यारा मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान,
यह सिर्फ संस्थान नहीं ,घरोंदा है यादो का किसी के लिए ,
यह सिर्फ कोलेज नहीं ,यादो को समेटेगा हम सब के लिए ............
बरगद का वह पेड़ ,कहाँ भूल पाएंगे ,
टपरे की वह कोफी और टी. ओ. की आई.मस्ती ,
प्रथम वर्ष में वो सेक में पकड़ कर लाया जाना ,
बिन कारण ही वो जी.टी. का लगा देना ,
इसी बीच वो लेक-व्यू का वो नजारा,
मंद-मंद समीर में तालाब का किनारा ,
हरी भरी घाटी और पुरातनी वो यादे ,
मातामंदिर का यह चौराहा और डी.बी में .मस्ती ,
हर एक मेनिटियन का कुछ यही है नाताबाना ,
जिसे समेटे रखेगा हमारा प्यारा ,
मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान.......
एक मेनिटियन की कलम से -------संजय जाटव-----

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

"जब -जब अपनों की याद आई , तब-तब मैंने लिखना चाहा"


जब -जब अपनों की याद आई  ,               
                         तब -तब मैंने रोना चाहा ,
         जब-जब समय ने धोका दिया , 
                     तब -तब मैंने लिखना चाहा , 
         जब-जब अपनों की याद आई ,
                     तब-तब मैंने लिखना चाहा , 
       हर लम्हों और यादो को मैंने , 
                   हर दम लिखना चाहा , 
      लिखना ही मेरी जिन्दगी है ,
                 मेरी आँखों में कभी आंसू तो कभी नमी है , 
     इन आंसुओ को मैंने हर दम लिखना चाहा , 
                 जब-जब दुनिया ने नाता तोडा , 
     कुछ अपनों और परायो ने छोड़ा ,
             तब -तब मैंने लिखना चाहा ,
       मेरी जिन्दगी में जब- जब कोई नयी शुरुवात हुई ,
                या छाया हो गम का अँधेरा ,
       हर घड़ी ,हर लम्हे को मैंने ,
                   तब-तब लिखना चाहा ,
     लिखना ही मेरी जिन्दगी है , 
                अतीत की यादो को पड़ना मेरा शोक ,
      अतीत की इन यादो मैं मैंने  हर दम डूबना चाहा , 
                          जब -जब अपनों की याद आई ,
        तब-तब मैंने लिखना चाहा , 
                      किनारों से कस्ती और कस्ती से फिर मस्ती तक, 
  खेतो से खलिहानों तक और खलिहानों से फिर बगियानो तक,  
                         चिड़िया की चाहको और सरसों की महकती फसलो तक ,
    सावन के हिलोरे और गाँव की माटी तक ,
                       उगते सूरज से ढलती  शाम तक ,
   माँ की लोरी से पिताजी की उम्मीदों तक ,
                  मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रोधोगिकी संस्थान के प्रांगण से गाँव की यादो तक, 
 इन यादो को मैंने हर दम लिखना चाहा ,
         जब-जब अतीत की याद आती है ,
      मेरी आंखे नम हो जाती है ,
स्कुल के उन दिनों को मैंने ,
       हर दम लिखना चाहा,
जिन स्कूली दिनों को मैंने हमेशा जीना चाहा  , 
       पर .................................,
   आँखों के इन आंसुओ ने मुझे ,
               हर दम रोकना चाहा , 
भीग जाते है आंसुओ में कागज सारे ,
          और कलम रोने पर मजबूर हो जाती है,
आंसुओ से भीगे इन कागजो , 
          और रोती कलम ने मुझे हर दम रोकना चाहा ,
जब-जब अपनों की याद आई ,
        तब -तब मैंने लिखना चाहा ....

बुधवार, 28 नवंबर 2012

"अनोखी जिन्दगी"



जिन्दगी एक सफ़र है
खुद को जानने का,
जिन्दगी एक सफ़र है
खुद को पहचानने का,
जिन्दगी ओ दरिया है
जो हर दम बहता है,
जिन्दगी ओ अतीत है
जो हर यादो में रहता है,
जिन्दगी एक मसाल है
कायम होने को,
जिन्दगी एक लडाई है
खुदको जीत जाने ,को ,
जिन्दगी एक सच्चाई है
मान जाने को,
जिन्दगी एक उपहार है
खुद को पहचान जाने को,
जिन्दगी बहुत कुछ है
नहीं है यह सब कुछ बनाने को,
जिन्दगी बचपन में हंसी दे जाती है
जवानी में यादे दे जाती है,
बुड़ापे में वापस आकर
सारी खुशिया ले जाती है,
जिन्दगी जीने का मजा आज में है
कल का इसका कोई भरोसा नहीं ,
जिन्दगी ,जिन्दगी है
इसकी न कोई परिभाषा है न कोई निश्चितता,
"जिन्दगी के आज को सवारने में ही
जिन्दगी के कल का मजा है "
जिन्दगी का यह खेल है मित्रो ,की हर दम यह मुझे लिखने पर मजबूर कर देती है ...........................संजय जाटव


शनिवार, 24 नवंबर 2012

"मैंने गाँवो को बदलते देखा है"


 
मैंने समय को बदलते देखा है,
संग समय के गाँवो को बदलते देखा है ,
गाँवो की उस पावन माटी को ,
कांक्रीट होते देखा है ,
अब नहीं उड़ा करती वो पावन माटी ,
मैंने गाँवो की डगर को अडिग होते देखा है ,
मैंने गाँवो को बदलते देखा है,
अब नहीं घुमा करते शेर भी जंगलो में ,
मैंने वनों को कटते ,जानवरों को भागते देखा है ,
वन के राजा को मैंने शर्कस में जाते देखा है ,
जो हुवा करता था जंगलो का राजा ,
उसी देश के गौरव को मैंने भूखे मरते देखा है ,
हाँ मैंने जंगल के राजा को चिड़ियाघर में बेबस देखा है,
मैंने गाँवो को शहर बनते देखा है ,
जो गाँव तो न रहे पर शहर भी न बन पाएँ,
मैंने गाँवो की ललित कलाओ को मरते देखा है ,
कहा रहे अब गाँवो के चौपाले ,
और कहा रही अब दीपों की रोशनी,
मैंने राम धुनों और प्रभातफेरी को बंद होते देखा है ,
बचपन में भोर में सुनाई देती थी रामधुने,
हाँ मैंने मंगलगीत की रीत को बंद होते देखा है ,
अब न तो मयुर ही गाता है ,
और न ही कोयल तान सुनाती है ,
मयुर को पलायन और कोयल के घोसले को तोड़ते देखा है,
मैंने गाँवो को बदलते देखा है ,
आधुनिकता की आँधी को मैंने ,
गाँवो में घुसते देखा है ,
जहर फेलते पश्चात्यता का मैंने ,
गाँवो के रग-रग में देखा है,
पावन रोशनी अब दीपों की बंद हुई,
मैंने बिजली को चोंधयाते देखा है,
धरती का सीना चीरती मैंने मशीनों को देखा है ,
मैंने स्वार्थी इंशान के बदलते चहरे को देखा है ,
मैंने गाँवो की माटी पर ,
शहर बसते देखा है ,
कारखानों का 
काला  धुँआ ,

गाँवो में फेलते देखा है,
मैंने गाँवो का परिवेश बदलते देखा है,
मैंने गाँवो की शांति को उजड़ते देखा है ,
हाँ मैंने गाँवो को बदलते देखा है .......संजय जाटव