"मेरे गाँव ने समेटे रखा ,यादो का जहां वो सारा"
जन्मा जहाँ और पाया दुलार ढेर सारा ,
आँखे खुली और देखा जहाँ से संसार यह सारा ,
बचपन बिता जहाँ , रह गया अब याद बनकर ,
बचपन में वो माटी से खेलना ,
देख पानी उस पर टूट जाना ,
कितना प्यारा था वो बचपन ,
न कल की फिकर थी न आज का चिन्तन ,
माँ की ममता और पिताजी का कन्धा ,
बस यही तो था मेरा धंधा ,
सुबह -सुबह वो चिड़िया की चहके ,
सूरज की रौशनी में ओस की बुँदे ,
लगती थी मानो जैसे मोती हो कोई ,
बचपन के वो खेल भी कहाँ भुला पाया हूँ ,
मिटटी में पानी मिला जहाँ छोटा सा घर बनाता था ,
लुका छुपी का खेल भी मन को कितना भाता था ,
समय भी संग-संग चल रहा था ,
छीन खिलोनो और खेलो को ,एक जगह ले गया ,
सुध न थी की क्या चल रहा है ,
बैठे थे कुछ बच्चे मै भी बैठ गया ,
थमा श्यामपट्ट हाथो मै चोक से कुछ बनाया था ,
घर गया तो बताया बेटा आज स्कुल गया था,
तब जाना की स्कुल था और छड़ी वाले टीचर ,
वर्षा हो या ठण्ड फिर तो स्कुल ही मन को भाया था ,
भरी बरसात मे कीचड़ रोंधकर कई बार जो स्कुल गया था ,
बचपन बिता जिस गाँव मे ,
बालकपन भी उसी मे बिता ,
अब तक जोड़ चूका पुस्तक पेन से नाता था ,
घर नहीं ,पर खेत मे बैठकर पड़ना मन को भाता था ,
खेतो की हरियाली और पेड़ो की मुस्कराहट ,
चिड़िया की चाहको और बगुले की आहट,
खेतो मे छल-छल करता सिचाई का जल ,
गेंदों पर मंडराता भंवरा और मेड़ पर पड़ा वो हल ,
कुछ नाते इन सब से बन गए थे ,
आम का वह पेड़ जैसे रोजाना इंतजार करता था ,
बैठ जिसके निचे मै ढलते सूरज को तकता था ,
शांति का गढ़ जो मैंने पा लिया था ,
प्रकृति की मुग्धता को पहचान लिया था ,
सुबह जितनी सुहानी होती थी ,
उतनी ही शाम भी होती थी ,
शाम होते ही उड़ती धुल मे,
गायों की हलचल होती थी ,
ढलते सूरज की रौशनी मे ,
लोटते पंछियों की सुरमय आवाजो मे ,
गो-खुरो के वो चिन्ह ,
आज भी प्रतीत होते है ,
शाम होते ही जो गायो की फिकर होती थी ,
खिला चारा जिनको माँ संतुष्ट होती थी ,
रहा बचपन जिस पावन माटी मे ,
और बालकपन भी जिसमे बीत गया ,
वही पावन गाँव मेरा ,
कॉलेज हेतु छुट गया ,
आज सब कुछ बदल गया है ,
पर मेरा बचपन ,मै और मेरा गाँव ,
आज भी यादो मै है ,
छुट्टियों में जाते ही जहाँ ,
सारे द्रश्य उभर आते है ,
कंक्रीट में दबी वो धुल और ,
गो-खुर कहीं नजर न आते है ,
जाता हूँ खेतो पर तो अनायास ही ,
सारे दिन वो याद आते है ,
बयां करता है वह ,
आम का पेड़ अपनी नाराजगी ,
खेत भी गुस्साए है मुझसे ,
फसल को चाहे नया सा लगूं ,
पर खेत के लिए तो में वही हूँ .............
-----संजय जाटव-----
बचपन में वो माटी से खेलना ,
देख पानी उस पर टूट जाना ,
कितना प्यारा था वो बचपन ,
न कल की फिकर थी न आज का चिन्तन ,
माँ की ममता और पिताजी का कन्धा ,
बस यही तो था मेरा धंधा ,
सुबह -सुबह वो चिड़िया की चहके ,
सूरज की रौशनी में ओस की बुँदे ,
लगती थी मानो जैसे मोती हो कोई ,
बचपन के वो खेल भी कहाँ भुला पाया हूँ ,
मिटटी में पानी मिला जहाँ छोटा सा घर बनाता था ,
लुका छुपी का खेल भी मन को कितना भाता था ,
समय भी संग-संग चल रहा था ,
छीन खिलोनो और खेलो को ,एक जगह ले गया ,
सुध न थी की क्या चल रहा है ,
बैठे थे कुछ बच्चे मै भी बैठ गया ,
थमा श्यामपट्ट हाथो मै चोक से कुछ बनाया था ,
घर गया तो बताया बेटा आज स्कुल गया था,
तब जाना की स्कुल था और छड़ी वाले टीचर ,
वर्षा हो या ठण्ड फिर तो स्कुल ही मन को भाया था ,
भरी बरसात मे कीचड़ रोंधकर कई बार जो स्कुल गया था ,
बचपन बिता जिस गाँव मे ,
बालकपन भी उसी मे बिता ,
अब तक जोड़ चूका पुस्तक पेन से नाता था ,
घर नहीं ,पर खेत मे बैठकर पड़ना मन को भाता था ,
खेतो की हरियाली और पेड़ो की मुस्कराहट ,
चिड़िया की चाहको और बगुले की आहट,
खेतो मे छल-छल करता सिचाई का जल ,
गेंदों पर मंडराता भंवरा और मेड़ पर पड़ा वो हल ,
कुछ नाते इन सब से बन गए थे ,
आम का वह पेड़ जैसे रोजाना इंतजार करता था ,
बैठ जिसके निचे मै ढलते सूरज को तकता था ,
शांति का गढ़ जो मैंने पा लिया था ,
प्रकृति की मुग्धता को पहचान लिया था ,
सुबह जितनी सुहानी होती थी ,
उतनी ही शाम भी होती थी ,
शाम होते ही उड़ती धुल मे,
गायों की हलचल होती थी ,
ढलते सूरज की रौशनी मे ,
लोटते पंछियों की सुरमय आवाजो मे ,
गो-खुरो के वो चिन्ह ,
आज भी प्रतीत होते है ,
शाम होते ही जो गायो की फिकर होती थी ,
खिला चारा जिनको माँ संतुष्ट होती थी ,
रहा बचपन जिस पावन माटी मे ,
और बालकपन भी जिसमे बीत गया ,
वही पावन गाँव मेरा ,
कॉलेज हेतु छुट गया ,
आज सब कुछ बदल गया है ,
पर मेरा बचपन ,मै और मेरा गाँव ,
आज भी यादो मै है ,
छुट्टियों में जाते ही जहाँ ,
सारे द्रश्य उभर आते है ,
कंक्रीट में दबी वो धुल और ,
गो-खुर कहीं नजर न आते है ,
जाता हूँ खेतो पर तो अनायास ही ,
सारे दिन वो याद आते है ,
बयां करता है वह ,
आम का पेड़ अपनी नाराजगी ,
खेत भी गुस्साए है मुझसे ,
फसल को चाहे नया सा लगूं ,
पर खेत के लिए तो में वही हूँ .............
-----संजय जाटव-----